अध्याय 12 of 1820 कुल श्लोक/पद
अध्याय १२ — भक्ति योग
भक्तियोग
सगुण-साकार और निर्गुण-निराकार उपासना का विवेचन, तथा उन आंतरिक गुणों का वर्णन जिनसे कोई साधक भगवान का अत्यंत प्रिय बनता है।
मुख्य विषय:सगुण व निर्गुण उपासनाभक्त के लक्षणभगवान के प्रिय
प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन
श्लोक 15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
Yasman-Nodvijate Loko Lokan-Nodvijate Cha Yah |
Harshamarsa-Bhayodvegair-Mukto Yah Sa Cha Me Priyah ||
श्लोकार्थ (हिन्दी):जिससे किसी भी प्राणी को कभी उद्वेग (कष्ट) नहीं होता और जो स्वयं भी किसी के व्यवहार से उद्वेलित नहीं होता, तथा जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त है—वह भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:आध्यात्मिक साधक की कसौटी उसकी आंतरिक शांति और दूसरों के प्रति उसका करुणामय, अहिंसक व्यवहार है।