सनातन वैदिक एवं भक्ति पुस्तकालय
कुरुक्षेत्र पावन संवाद · ७०० श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता

ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का दिव्य समन्वय
Chapter 2, Verse 47निष्काम कर्मयोग का शाश्वत सिद्धांत

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

श्लोकार्थ (हिन्दी):

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल के हेतु मत बनो और तुम्हारी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।

गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:

Focus entirely on righteous effort and duty in the present moment without being agitated by outcomes or expectations.

श्रीमद्भगवद्गीता — सम्पूर्ण १८ अध्याय

किसी भी अध्याय का बहुलिपि व अर्थ सहित अध्ययन करें
अध्याय 147 कुल श्लोक/पद

अध्याय १ — अर्जुन विषाद योग

अर्जुनविषादयोग

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच स्थित होकर अर्जुन अपने बंधु-बांधवों, गुरुओं और संबंधियों को देखकर मोह और शोक से ग्रस्त हो जाते हैं और धनुष-बाण त्यागकर बैठ जाते हैं।

कुरुक्षेत्र युद्धभूमिमोहमग्न अर्जुन
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अध्याय 272 कुल श्लोक/पद

अध्याय २ — सांख्य योग

साङ्ख्ययोग

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता, सुख-दुःख में समता और फल की इच्छा के बिना केवल कर्तव्य कर्म करने का उपदेश देते हैं तथा स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बताते हैं।

आत्मा की अमरतानिष्काम कर्मयोग
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अध्याय 343 कुल श्लोक/पद

अध्याय ३ — कर्म योग

कर्मयोग

कर्म त्यागने से संन्यास नहीं मिलता, अपितु समाज कल्याण और लोकसंग्रह के लिए कर्तव्य कर्म करना अनिवार्य है। काम और क्रोध को ज्ञान रूपी अग्नि से वश में करने का संदेश।

यज्ञार्थ कर्मलोकसंग्रह
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अध्याय 442 कुल श्लोक/पद

अध्याय ४ — ज्ञान कर्म संन्यास योग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

धर्म की स्थापना हेतु भगवान के अवतार का रहस्य, कर्म में अकर्म की दृष्टि और ज्ञान रूपी नौका से संसार-सागर पार करने की विधि।

ईश्वर का अवतारज्ञान-यज्ञ
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अध्याय 647 कुल श्लोक/पद

अध्याय ६ — आत्मसंयम योग

आत्मसंयमयोग

ध्यान का आसन, मन को एकाग्र करने की साधना, और चंचल मन को अभ्यास व वैराग्य द्वारा वश में करने की विधि।

ध्यान विधिमन का निग्रह
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अध्याय 934 कुल श्लोक/पद

अध्याय ९ — राजविद्या राजगुह्य योग

राजविद्याराजगुह्ययोग

परम ज्ञान और परम रहस्य का प्रतिपादन, ईश्वर की सर्वव्यापकता और अनन्य भक्तों के संरक्षण का दिव्य वचन।

अनन्य भक्तियोगक्षेम
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अध्याय 1220 कुल श्लोक/पद

अध्याय १२ — भक्ति योग

भक्तियोग

सगुण-साकार और निर्गुण-निराकार उपासना का विवेचन, तथा उन आंतरिक गुणों का वर्णन जिनसे कोई साधक भगवान का अत्यंत प्रिय बनता है।

सगुण व निर्गुण उपासनाभक्त के लक्षण
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अध्याय 1878 कुल श्लोक/पद

अध्याय १८ — मोक्ष संन्यास योग

मोक्षसंन्यासयोग

संपूर्ण गीता का सार—त्याग का वास्तविक स्वरूप, सात्विक कर्म और बुद्धि, तथा भगवान के चरणों में पूर्ण शरणागति का अंतिम महावाक्य।

त्याग और संन्यासत्रिविध श्रद्धा व कर्म
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