अध्याय 6 of 1847 कुल श्लोक/पद
अध्याय ६ — आत्मसंयम योग
आत्मसंयमयोग
ध्यान का आसन, मन को एकाग्र करने की साधना, और चंचल मन को अभ्यास व वैराग्य द्वारा वश में करने की विधि।
मुख्य विषय:ध्यान विधिमन का निग्रहअभ्यास और वैराग्य
प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन
श्लोक 5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
Uddhared-Atmanatmanam Natmanam-Avasadayet |
Atmaiva Hy-Atmano Bandhur-Atmaiva Ripur-Atmanah ||
श्लोकार्थ (हिन्दी):मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न गिराए; क्योंकि यह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:हमारा अपना नियंत्रित मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र है, और अनियंत्रित मन ही सबसे घातक शत्रु।