अध्याय 9 of 1834 कुल श्लोक/पद
अध्याय ९ — राजविद्या राजगुह्य योग
राजविद्याराजगुह्ययोग
परम ज्ञान और परम रहस्य का प्रतिपादन, ईश्वर की सर्वव्यापकता और अनन्य भक्तों के संरक्षण का दिव्य वचन।
मुख्य विषय:अनन्य भक्तियोगक्षेमपत्रं पुष्पं फलं तोयं
प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन
श्लोक 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
Ananyas-Chintayanto Mam Ye Janah Paryupasate |
Tesham Nityabhiyuktanam Yoga-Kshemam Vahamy-Aham ||
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो अनन्य प्रेमी भक्त केवल मेरा ही चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन निरंतर मुझ में लगे हुए भक्तों के योग और क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:पूर्ण शरणागति पर परमात्मा द्वारा भक्त के समस्त सांसारिक और आध्यात्मिक दायित्वों का भार स्वयं उठा लेना।
श्लोक 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
Patram Pushpam Phalam Toyam Yo Me Bhaktya Prayachchhati |
Tad-Aham Bhakty-Upahritam-Ashnami Prayatatmanah ||
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो कोई भक्त मुझे प्रेमपूर्वक एक पत्ता, एक पुष्प, एक फल अथवा केवल जल भी अर्पित करता है, उस शुद्ध हृदय भक्त द्वारा प्रेम से दी गई भेंट को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।
गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:पूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, हृदय का प्रेम और समर्पण ही परमात्मा को प्रिय है।