श्रीमद्भगवद्गीता के पांच आधारभूत स्तम्भ (ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल व कर्म)
संपूर्ण ७०० श्लोकों का तात्विक सार—ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, काल और कर्म के अंतर्संबंध का दार्शनिक विश्लेषण।
- •गीता के ५ विषय: ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल और कर्म।
- •कर्म ही एकमात्र ऐसा तत्व है जिसे ज्ञान और विवेक द्वारा बदला जा सकता है।
- •निष्काम कर्म और आत्म-समर्पण ही मुक्ति का मूल मंत्र है।
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण व्यावहारिक संहिता है। गीता का ज्ञान पांच मौलिक सत्यों पर आधारित है:
१. ईश्वर (परम नियंता): भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे ही संपूर्ण जगत के उद्भव और प्रलय के परम स्रोत हैं। वे सर्वव्यापी, अजन्मा और अंतर्यामी हैं।
२. जीव (जीवात्मा): जीव ईश्वर का ही नित्य, सनातन अंश है। शरीर नश्वर है परंतु आत्मा अमर है।
३. प्रकृति (भौतिक संसार): त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) माया, जिसमें ८ तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार) समाहित हैं।
४. काल (समय): परिवर्तन और गति का नियामक, जो अनादि और अनंत है।
५. कर्म (क्रिया और प्रतिक्रिया): अन्य चार तत्व नित्य हैं, किंतु कर्म परिवर्तनशील है। निष्काम कर्मयोग द्वारा मनुष्य कर्म-बंधनों से मुक्त हो सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीता · ईशावास्योपनिषद्