माला जप के शास्त्रसम्मत नियम एवं १०८ मनकों का वैज्ञानिक रहस्य
जप करते समय माला को कैसे पकड़ें, सुमेरु का उल्लंघन क्यों न करें, और १०८ मनकों की आध्यात्मिक व खगोलीय गणना क्या है।
- •माला जप में तर्जनी उंगली का स्पर्श वर्जित है।
- •१०८ मनके खगोलीय दूरी और शरीर के १०८ ऊर्जा केंद्रों के संतुलन का प्रतीक हैं।
- •सुमेरु को लांघना नहीं चाहिए, वहीं से माला को उलट कर फेरना चाहिए।
- •जप सदैव गोमुखी (जप थैली) के भीतर या ढककर करना चाहिए।
सनातन साधना परंपरा में मंत्र जप को चित्त शुद्धि और आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल एवं प्रभावशाली साधन माना गया है। शास्त्रों में जप के लिए माला धारण और जप की निश्चित विधियां वर्णित हैं।
माला में १०८ मनके होने का गहरा खगोलीय और यौगिक आधार है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास की लगभग १०८ गुनी है। इसी प्रकार चंद्र और पृथ्वी की दूरी चंद्रमा के व्यास की १०८ गुनी है। मानव शरीर में १०८ मुख्य ऊर्जा नाड़ियां (मर्म स्थान) होती हैं जो अनाहत चक्र (हृदय) पर मिलती हैं। अतः १०८ बार मंत्र जप करने से संपूर्ण शरीर के ऊर्जा केंद्र जाग्रत होते हैं।
जप करते समय माला को मध्यमा (बीच की उंगली) और अंगूठे के संयोग से आगे बढ़ाना चाहिए। तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उंगली) को अहंकार का प्रतीक माना गया है, अतः इसे माला से स्पर्श नहीं कराना चाहिए।
माला के शीर्ष पर स्थित सबसे बड़े मनके को "सुमेरु" अथवा "गुरु मनका" कहा जाता है। जप करते हुए जब सुमेरु पर पहुंचें, तो उसे लांघा नहीं जाता, बल्कि माला को वहीं से घुमाकर उल्टी दिशा में नया चक्र प्रारंभ किया जाता है।
अग्नि पुराण (अध्याय २१४) · लिंग पुराण · मंत्र महोदधि