अध्याय ३ — कर्म योग
कर्मयोग
कर्म त्यागने से संन्यास नहीं मिलता, अपितु समाज कल्याण और लोकसंग्रह के लिए कर्तव्य कर्म करना अनिवार्य है। काम और क्रोध को ज्ञान रूपी अग्नि से वश में करने का संदेश।
प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):अर्जुन पूछते हैं: यदि तुम्हारे मत में बुद्धि कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे कृष्ण, मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हो?
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):तुम्हारी बातें मुझे मिश्रित और भ्रमित करने वाली लगती हैं। वह एक निश्चित मार्ग बताओ जिससे मैं परम कल्याण प्राप्त कर सकूँ।
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):हे निष्पाप, इस संसार में दो निष्ठाएँ मैंने कही हैं—सांख्यों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):केवल कर्मों का आरम्भ न करने से निष्कर्म्यता नहीं मिलती और केवल बाहरी संन्यास से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):कोई भी मनुष्य क्षणभर भी पूर्णतः कर्मरहित नहीं रह सकता; प्रकृति के गुण सबको कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन में विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मोहित और मिथ्याचारी कहलाता है।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):पर जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर कर्मयोग करता है, वही श्रेष्ठ है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):अपने नियत कर्म को करो; अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है। कर्म न करने पर शरीर-यात्रा भी नहीं चल सकती।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यज्ञ के लिए किया गया कर्म बंधन नहीं देता; अन्य कर्म बांधते हैं। इसलिए आसक्ति छोड़कर यज्ञभाव से कर्म करो।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजाओं की सृष्टि करके कहा—इसके द्वारा समृद्ध होओ; यह तुम्हारी श्रेष्ठ कामनाओं को पूरा करे।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इस यज्ञ से देवशक्तियों का पोषण करो और वे तुम्हारा पोषण करें; परस्पर सहयोग से परम कल्याण प्राप्त करोगे।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यज्ञ से प्रसन्न देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे; जो उन्हें लौटाए बिना भोगता है, वह चोर ही है।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यज्ञशेष खाने वाले सज्जन सभी पापों से मुक्त होते हैं; जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न होता है, यज्ञ से वर्षा होती है और कर्म से यज्ञ उत्पन्न होता है।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जानो कि कर्म पवित्र ज्ञान से और वह ज्ञान अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न होता है; इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में नित्य प्रतिष्ठित है।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो इस प्रकार चलाए गए चक्र का पालन नहीं करता और इन्द्रियसुख में ही लगा रहता है, उसका जीवन व्यर्थ है।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो आत्मा में ही आनंदित, आत्मा में तृप्त और आत्मा में संतुष्ट है, उसके लिए कोई व्यक्तिगत अनिवार्य कर्तव्य नहीं रहता।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):उसका न कर्म करने में कोई स्वार्थपूर्ण लाभ है, न कर्म न करने में कोई हानि; किसी प्राणी पर उसका स्वार्थपूर्ण आश्रय नहीं।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इसलिए आसक्ति रहित होकर निरंतर अपना कर्तव्य करो; अनासक्त कर्म से मनुष्य परम को प्राप्त करता है।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जनक आदि ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की; लोकसंग्रह अर्थात् जगत् के कल्याण को देखते हुए तुम्हें भी कर्म करना चाहिए।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग वैसा ही करते हैं; वह जो मानदण्ड स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरा कोई अनिवार्य कर्तव्य नहीं है और न कोई अप्राप्त वस्तु मुझे प्राप्त करनी है; फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ, तो लोग हर प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ, तो ये लोक नष्ट हो जाएँगे; अव्यवस्था फैलेगी और प्रजाओं का अहित होगा।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):अज्ञानी आसक्ति से जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को भी आसक्ति छोड़कर लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करो; ज्ञानी स्वयं योगयुक्त होकर कर्म करे और सबको अपने कर्तव्य में लगाए।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):प्रकृति के गुण ही सब कर्म करते हैं, पर अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है—‘मैं कर्ता हूँ।’
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):तत्त्वज्ञानी जानता है कि गुण ही गुणों में प्रवृत्त हैं; यह समझकर वह कर्मों के प्रति आसक्त नहीं होता।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):प्रकृति के गुणों से मोहित लोग गुणजन्य कर्मों में आसक्त होते हैं; पूर्णज्ञानी को उनकी समझ विचलित नहीं करनी चाहिए।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):सभी कर्म मुझे अर्पित करके, आत्मचिन्तन से युक्त, आशारहित और ममतारहित होकर, भीतर की व्याकुलता छोड़कर युद्ध करो।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जो मनुष्य श्रद्धा से और दोषदृष्टि रहित होकर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):पर जो इसे दोष देकर नहीं मानते, उन्हें सब ज्ञान में मोहित, विवेकहीन और नष्ट समझो।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):ज्ञानी मनुष्य भी अपने स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करता है; सभी प्राणी अपनी प्रकृति का अनुसरण करते हैं। केवल दमन से क्या होगा?
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):हर इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष रहते हैं; उनके वश में मत आओ, क्योंकि वे साधना के मार्ग में बाधक हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):गुणहीन ढंग से किया हुआ अपना धर्म भी दूसरे के धर्म को अच्छी तरह करने से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है; परधर्म भयावह है।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):अर्जुन पूछते हैं: हे कृष्ण, मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध भी पाप करने को मानो बलपूर्वक क्यों प्रेरित होता है?
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यह काम है, और यही रजोगुण से उत्पन्न क्रोध है; यह अतृप्त और महान पापमय है। इसे यहाँ अपना शत्रु जानो।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ से भ्रूण ढक जाता है, वैसे ही इससे ज्ञान ढक जाता है।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):यह अतृप्त अग्नि के समान काम ज्ञानियों का नित्य शत्रु है और ज्ञान को ढक देता है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवासस्थान हैं; इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर देही को मोहित करता है।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करो और ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करने वाले इस पापरूप शत्रु का नाश करो।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ कही गई हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और बुद्धि से भी परे वह आत्मा है।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):आत्मा को बुद्धि से भी श्रेष्ठ जानकर, आत्मा द्वारा मन को स्थिर करो और कामरूप कठिन शत्रु को जीत लो।