सनातन वैदिक एवं भक्ति पुस्तकालय
अध्याय 4 of 1842 कुल श्लोक/पद

अध्याय ४ — ज्ञान कर्म संन्यास योग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

धर्म की स्थापना हेतु भगवान के अवतार का रहस्य, कर्म में अकर्म की दृष्टि और ज्ञान रूपी नौका से संसार-सागर पार करने की विधि।

मुख्य विषय:ईश्वर का अवतारज्ञान-यज्ञकर्म अकर्म का भेद

प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन

श्लोक 7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

Yada Yada Hi Dharmasya Glanir-Bhavati Bharata | Abhyutthanam-Adharmasya Tadatmanam Srijamy-Aham ||

श्लोकार्थ (हिन्दी):हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अपने साकार रूप को प्रकट करता हूँ।

गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:सृष्टि में नैतिक संतुलन और सत्य की रक्षा के लिए ईश्वरीय शक्ति का शाश्वत अवतरण।
श्लोक 8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

Paritranaya Sadhoonam Vinashaya Cha Dushkritam | Dharma-Samsthapanarthaya Sambhavami Yuge Yuge ||

श्लोकार्थ (हिन्दी):सज्जनों और साधुओं के उद्धार के लिए, पापी व दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:सत्य, न्याय और सात्विकता की पुनर्स्थापना ही ईश्वरीय अवतार का मूल प्रयोजन है।
श्लोक 38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

Na Hi Jnanena Sadrisham Pavitram-Iha Vidyate | Tat-Svayam Yoga-Samsiddhah Kalenatmani Vindati ||

श्लोकार्थ (हिन्दी):इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय पाकर उस आत्मज्ञान को अपने अंतःकरण में स्वतः प्राप्त कर लेता है।

गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:आत्मज्ञान ही समस्त मलों और भ्रांतियों को भस्म करने वाली परम औषधि है।