अध्याय ४ — ज्ञान कर्म संन्यास योग
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
धर्म की स्थापना हेतु भगवान के अवतार का रहस्य, कर्म में अकर्म की दृष्टि और ज्ञान रूपी नौका से संसार-सागर पार करने की विधि।
प्रमुख श्लोक एवं दार्शनिक विवेचन
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अपने साकार रूप को प्रकट करता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):सज्जनों और साधुओं के उद्धार के लिए, पापी व दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
श्लोकार्थ (हिन्दी):इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय पाकर उस आत्मज्ञान को अपने अंतःकरण में स्वतः प्राप्त कर लेता है।