सनातन वैदिक एवं भक्ति पुस्तकालय
स्तोत्र🕉️भगवान शिव7 मिनट

शिव ताण्डव स्तोत्रम्

लंकारेश रावण द्वारा रचित भगवान शिव का परम ओजस्वी, पंचचामर छन्द में निबद्ध स्तुति-स्तोत्र।

मूल शास्त्र संदर्भ: शिव पुराण / रामायण परंपरा
पारंपरिक रचयिता: रावण (दशानन)
लिपि (Script):
अर्थ भाषा (Meaning):
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जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥

शब्दार्थ (अर्थ) (Hindi):सघन जटारूपी वन से निकलती हुई गंगाजी की गिरती धाराओं से पवित्र हुए कंठ प्रदेश पर विशाल सर्प की लटकती माला को धारण किए हुए, डमरू की 'डमड्-डमड्' ध्वनि के साथ जो प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे कल्याणकारी भगवान शिव हमारा कल्याण करें।

गूढ़ भावार्थ एवं तत्व:भगवान शिव के संहारक और कल्याणकारी नटराज स्वरूप का प्रथम ओजस्वी मंगलाचरण।
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जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

शब्दार्थ (अर्थ) (Hindi):जिनके जटारूपी कड़ाह में तीव्र वेग से घूमती हुई देवनदी गंगा की चंचल तरंग-लताएं मस्तक पर शोभा पा रही हैं, जिनके ललाट के धधकते हुए अग्निपुंज में बाल-चंद्रमा सुशोभित हैं, उन चंद्रशेखर शिव में मेरी प्रतिक्षण प्रीति बनी रहे।

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धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥

शब्दार्थ (अर्थ) (Hindi):पर्वतराज हिमाचल की पुत्री पार्वती जी के विलासपूर्ण कटाक्षों से जिनका मन प्रफुल्लित रहता है, जिनकी असीम कृपा-दृष्टि मात्र से भक्तों की कठिन से कठिन आपत्तियां नष्ट हो जाती हैं, ऐसे दिगंबर शिव में मेरा मन रम जाए।

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जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वadhūमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥

शब्दार्थ (अर्थ) (Hindi):जिनके जटाओं में लिपटे सर्पों के मणियों की पीताभ लाल आभा से दिशाओं रूपी वधुओं का मुख कुंकुम-रंजित सा प्रतीत होता है, और जो गजचर्म का उत्तरीय धारण किए हुए हैं, उन समस्त भूतों के स्वामी शिव में मेरा मन आनंदित रहे।

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सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥

शब्दार्थ (अर्थ) (Hindi):इंद्र आदि समस्त देवताओं के मस्तक पर चढ़े पुष्पों की धूलि से जिनका चरण-पीठ धूसरित है, और जिनकी जटाएं नागराज की माला से बंधी हैं, वे चंद्रमौली शिव हमें चिरकाल तक अक्षय कल्याण प्रदान करें।

फलश्रुति एवं महात्म्य & पूजा विधि एवं शास्त्र सम्मत नियम

फलश्रुति एवं महात्म्य (Hindi):

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥

पूजा विधि एवं शास्त्र सम्मत नियम (Hindi):

प्रदोष काल अथवा प्रातःकाल स्नान के पश्चात शिवलिंग अथवा भगवान शिव के चित्र के समक्ष पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लयबद्ध स्वर में पाठ करें।

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